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Author(s):
शिवानी देवी.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
1-7 |
कबीर के काव्य में सामाजिक चेतना और धार्मिक समन्वय
Abstract
मध्यकालीन भारतीय समाज सामाजिक विषमताओं, जातिगत भेदभाव, धार्मिक कट्टरता और कर्मकांडों से ग्रस्त था। ऐसे समय में संत कबीर ने अपने काव्य के माध्यम से समाज में व्याप्त इन कुरीतियों का निर्भीक विरोध किया और मानवता, समानता तथा सत्य के आदर्शों को स्थापित करने का प्रयास किया। कबीर ने जाति-व्यवस्था, ऊँच-नीच तथा धार्मिक पाखंडों की आलोचना करते हुए यह प्रतिपादित किया कि मनुष्य की श्रेष्ठता उसके जन्म या धर्म से नहीं, बल्कि उसके आचरण और ज्ञान से निर्धारित होती है। उनके दोहे और साखियाँ सामाजिक जागरण तथा नैतिक चेतना के प्रभावी माध्यम के रूप में सामने आते हैं। कबीर के काव्य में धार्मिक समन्वय की भावना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों की संकीर्णताओं और बाहरी आडंबरों की आलोचना करते हुए यह संदेश दिया कि परमात्मा एक है और उसकी प्राप्ति के लिए सच्चे मन, प्रेम और भक्ति की आवश्यकता होती है। निर्गुण भक्ति की परंपरा के अंतर्गत कबीर ने ईश्वर को निराकार और सर्वव्यापी माना तथा यह बताया कि सच्चा धर्म बाहरी कर्मकांडों में नहीं, बल्कि अंतःकरण की शुद्धता और आत्मिक साधना में निहित है। इसके अतिरिक्त कबीर की भाषा और शैली भी अत्यंत सरल, लोकाभिमुख और प्रभावपूर्ण है, जिसके माध्यम से उनके विचार जनसामान्य तक सहज रूप से पहुँचे। इस प्रकार कबीर का काव्य सामाजिक चेतना, धार्मिक सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों की स्थापना का सशक्त माध्यम सिद्ध होता है तथा आज भी समान रूप से प्रासंगिक बना हुआ है।
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Author(s):
कोमल यादव.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
8-14 |
दिनकर की ‘रश्मिरथी’ में कर्ण का आधुनिक स्वरूप
Abstract
प्रस्तुत शोध-पत्र में रामधारी सिंह दिनकर की प्रसिद्ध प्रबंध काव्य रचना रश्मिरथी में चित्रित कर्ण के आधुनिक स्वरूप का विश्लेषण किया गया है। महाभारत के पारंपरिक आख्यान में कर्ण एक वीर योद्धा, दानवीर और दुर्योधन के निष्ठावान मित्र के रूप में प्रस्तुत होता है, किंतु दिनकर ने उसे केवल पौराणिक पात्र के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिक सामाजिक चेतना के प्रतिनिधि के रूप में पुनर्सृजित किया है। इस अध्ययन में यह प्रतिपादित किया गया है कि ‘रश्मिरथी’ का कर्ण जन्माधारित सामाजिक व्यवस्था, विशेषतः जाति-व्यवस्था, के विरुद्ध प्रतिरोध का सशक्त प्रतीक है। दिनकर कर्ण के माध्यम से यह स्थापित करते हैं कि मनुष्य की श्रेष्ठता उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसके गुण, कर्म और संघर्ष से निर्धारित होती है। कर्ण का चरित्र सामाजिक उपेक्षा, आत्मसम्मान, कृतज्ञता, दानशीलता और नैतिक द्वंद्व जैसे मानवीय आयामों से निर्मित है। उसके संवादों में सामाजिक विषमता के प्रति तीव्र आक्रोश और समानता की चेतना दिखाई देती है। साथ ही, दुर्योधन के प्रति उसकी निष्ठा, कुंती-संवाद और कवच-कुंडल दान जैसे प्रसंग उसके चरित्र के गहन मानवीय और नैतिक पक्ष को उद्घाटित करते हैं। समकालीन संदर्भ में कर्ण का व्यक्तित्व वंचित और उपेक्षित वर्ग की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है। इस प्रकार ‘रश्मिरथी’ का कर्ण केवल एक पौराणिक नायक नहीं, बल्कि आधुनिक सामाजिक न्याय, मानवीय गरिमा और आत्मसम्मान की चेतना का प्रतीक बनकर उभरता है।
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Author(s):
कृति पाण्डेय.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
15-21 |
तुलसीदास के काव्य में भक्ति और लोकमंगल की भावना
Abstract
यह शोध-पत्र तुलसीदास के काव्य में निहित भक्ति और लोकमंगल की भावना का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। मध्यकालीन भक्ति आंदोलन की पृष्ठभूमि में तुलसीदास ने अपने काव्य के माध्यम से रामभक्ति को जनसामान्य तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उनके साहित्य में भगवान राम के प्रति अनन्य प्रेम, समर्पण, श्रद्धा और दास्य भाव की अभिव्यक्ति मिलती है। तुलसीदास की भक्ति सगुण भक्ति परंपरा से संबद्ध है, जिसमें भगवान राम को मर्यादा, धर्म और आदर्श जीवन मूल्यों के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया है। तुलसीदास के काव्य की विशेषता यह है कि उसमें भक्ति के साथ-साथ लोकमंगल की व्यापक भावना भी विद्यमान है। उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से धर्म, नीति, सदाचार, करुणा और परोपकार जैसे मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा की तथा रामराज्य की कल्पना के माध्यम से एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था का चित्र प्रस्तुत किया। इस प्रकार तुलसीदास की भक्ति व्यक्तिगत आध्यात्मिक साधना तक सीमित न रहकर समाज के नैतिक और सांस्कृतिक उत्थान का माध्यम बन जाती है। अतः यह स्पष्ट होता है कि तुलसीदास के काव्य में भक्ति और लोकमंगल का गहरा समन्वय है। उनके साहित्य में व्यक्त मानवीय आदर्श और नैतिक मूल्य हिन्दी साहित्य और भारतीय समाज के लिए आज भी अत्यंत प्रासंगिक और प्रेरणादायक हैं।
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Author(s):
शालिनी यादव.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
22-28 |
राष्ट्रीय आंदोलन और हिन्दी उपन्यासों में दलित चेतना
Abstract
प्रस्तुत शोध–लेख में राष्ट्रीय आंदोलन और पूर्व–स्वाधीनता कालीन हिन्दी उपन्यासों में अभिव्यक्त दलित चेतना का विश्लेषण किया गया है। भारतीय समाज में जाति–व्यवस्था ने जहाँ सामाजिक संरचना को व्यवस्थित किया, वहीं उसने अस्पृश्यता, बहिष्कार और मानवीय गरिमा के हनन को भी स्थायी रूप दिया। उन्नीसवीं शताब्दी के समाज–सुधार आंदोलनों से प्रारंभ होकर बीसवीं शताब्दी के राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन तक दलित प्रश्न सामाजिक से राजनीतिक विमर्श का विषय बन गया। इस परिवर्तन ने हिन्दी उपन्यासों को गहरे रूप में प्रभावित किया। प्रेमचन्द के ‘प्रेमाश्रम’, ‘रंगभूमि’, ‘कर्मभूमि’ और ‘गोदान’ में जातिगत शोषण, सामाजिक पाखंड और आत्मसम्मान की चेतना का यथार्थ चित्रण मिलता है। ‘प्रेमाश्रम’ में जाति-आधारित श्रम-विभाजन और प्रतिरोध, ‘रंगभूमि’ में प्रीतिभोज के माध्यम से समता का प्रतीकात्मक उद्घोष, ‘कर्मभूमि’ में शैक्षिक बहिष्कार तथा ‘गोदान’ में धार्मिक पाखंड की आलोचना ये सभी प्रसंग दलित चेतना के विविध आयामों को स्पष्ट करते हैं। इसी प्रकार जयशंकर प्रसाद के ‘कंकाल’ तथा पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ के ‘मनुष्यानन्द’ में भी जातिगत विषमता और सामाजिक संकीर्णता पर तीखा प्रहार किया गया है। अंततः यह सिद्ध होता है कि पूर्व–स्वाधीनता हिन्दी उपन्यासों में दलित चेतना केवल करुणा का भाव नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय गरिमा की स्थापना का सशक्त साहित्यिक प्रयास है। राष्ट्रीय आंदोलन और हिन्दी उपन्यासों की यह चेतना परस्पर पूरक सिद्ध होती है।
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Author(s):
प्रतिभा कुमारी.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
29-34 |
सुमित्रानंदन पंत के काव्य में प्रकृति-सौंदर्य का भावात्मक स्वरूप
Abstract
छायावादी काव्यधारा में प्रकृति-चित्रण का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है और सुमित्रानंदन पंत को इस धारा का प्रमुख तथा प्रकृति के सुकुमार कवि के रूप में विशेष पहचान प्राप्त है। पंत के काव्य में प्रकृति केवल दृश्य सौंदर्य का विषय नहीं है, बल्कि वह कवि की संवेदनाओं, अनुभूतियों और कल्पना का अभिन्न अंग बनकर सामने आती है। उनके काव्य में पर्वत, वन, पुष्प, चाँदनी, बादल और ऋतुओं के विविध रूप अत्यंत सजीव और भावपूर्ण ढंग से चित्रित हुए हैं। पंत ने प्रकृति के माध्यम से प्रेम, करुणा, आशा और आनंद जैसे मानवीय भावों की अभिव्यक्ति की है। उनके काव्य में प्रकृति का मानवीकरण भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जहाँ प्रकृति कभी माता, कभी सखी और कभी प्रेयसी के रूप में कवि के साथ आत्मीय संबंध स्थापित करती है। साथ ही उनके काव्य में प्रकृति के माध्यम से आध्यात्मिक अनुभूति और दार्शनिक चेतना का भी संकेत मिलता है। इस प्रकार पंत का प्रकृति-चित्रण केवल सौंदर्य-बोध तक सीमित नहीं है, बल्कि वह मानव जीवन, संवेदना और दर्शन से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। अतः पंत के काव्य में प्रकृति-सौंदर्य का भावात्मक स्वरूप हिन्दी काव्य परंपरा में एक महत्वपूर्ण और विशिष्ट स्थान रखता है।