कबीर के काव्य में सामाजिक चेतना और धार्मिक समन्वय

सबद शोध पत्रिका

सबद

राष्ट्रीय, सहकर्मी-समीक्षित (पीयर-रिव्यूड) त्रैमासिक शोध पत्रिका

ISSN: Applied (Online) 
ISSN: Applied (Print)

Call For Paper - Volume - 1 Issue - 2 (April - June 2026)
Article Title

कबीर के काव्य में सामाजिक चेतना और धार्मिक समन्वय

Author(s) शिवानी देवी.
Country India
Abstract

मध्यकालीन भारतीय समाज सामाजिक विषमताओं, जातिगत भेदभाव, धार्मिक कट्टरता और कर्मकांडों से ग्रस्त था। ऐसे समय में संत कबीर ने अपने काव्य के माध्यम से समाज में व्याप्त इन कुरीतियों का निर्भीक विरोध किया और मानवता, समानता तथा सत्य के आदर्शों को स्थापित करने का प्रयास किया। कबीर ने जाति-व्यवस्था, ऊँच-नीच तथा धार्मिक पाखंडों की आलोचना करते हुए यह प्रतिपादित किया कि मनुष्य की श्रेष्ठता उसके जन्म या धर्म से नहीं, बल्कि उसके आचरण और ज्ञान से निर्धारित होती है। उनके दोहे और साखियाँ सामाजिक जागरण तथा नैतिक चेतना के प्रभावी माध्यम के रूप में सामने आते हैं। कबीर के काव्य में धार्मिक समन्वय की भावना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों की संकीर्णताओं और बाहरी आडंबरों की आलोचना करते हुए यह संदेश दिया कि परमात्मा एक है और उसकी प्राप्ति के लिए सच्चे मन, प्रेम और भक्ति की आवश्यकता होती है। निर्गुण भक्ति की परंपरा के अंतर्गत कबीर ने ईश्वर को निराकार और सर्वव्यापी माना तथा यह बताया कि सच्चा धर्म बाहरी कर्मकांडों में नहीं, बल्कि अंतःकरण की शुद्धता और आत्मिक साधना में निहित है। इसके अतिरिक्त कबीर की भाषा और शैली भी अत्यंत सरल, लोकाभिमुख और प्रभावपूर्ण है, जिसके माध्यम से उनके विचार जनसामान्य तक सहज रूप से पहुँचे। इस प्रकार कबीर का काव्य सामाजिक चेतना, धार्मिक सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों की स्थापना का सशक्त माध्यम सिद्ध होता है तथा आज भी समान रूप से प्रासंगिक बना हुआ है।

Area हिन्दी साहित्य
Issue Volume 1, Issue 1 (January - March 2026)
Published 2026/03/02
How to Cite सबद पत्रिका, 1(1), 1-7.

PDF View / Download PDF File